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घर अपना जन्नत सा लगता है...

छोटा सा ही सही,
घर अपना तो जन्नत सा लगता है.
दो कमरे, चार दीवारें हो चाहे तेरे लिए,
मेरे लिए तो यहाँ सारा जहां बसता है...

सूरज खिले चाहे कहीं से,
सवेरा मेरा तो इस दर से होता है.
दो चिरागों से ही रोशन सही,
घर मेरा किसी महफ़िल सा सजता है.

मंदिर - मस्ज़िद ना फिरूं चाहे,
आशीर्वाद तो सच्चा माँ-पिता से मिलता है.
कहूँ क्या मैं उस नन्ही परी से,
प्यार उससे तो दिल बेशुमार करता है.

छोटा सा ही सही,
घर अपना तो जन्नत सा लगता है.

3 comments:

kase kahun?by kavita. said...

bahut sundar bhav hai. sach hai ghar se sundar,nyara kuchh nahi.

अभिन्न said...

पुनीत भाई आपका घर वाकई सबसे सुन्दर है जन्नत इसी का नाम है जहाँ हम सब प्रेमभाव से रहते है आपके घर ओर घर के सभी सदस्यों के लिए अनेकानेक शुभकामनाएं

संजय भास्कर said...

शुभकामनाएं

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