मोहब्बत में तेरी डूब गया हूँ इतना कि,
तसवीरें भी तेरी बोलती हैं आजकल।
बैठे बैठे बतियाता हूँ उन्हीं से कि,
तुझे सोच सोच पगलाता हूँ आजकल।
रह रहा हूँ मैं यादों में तेरी कि,
रह रही है तू मुझ में आजकल।
मैं मानूं ये सौगातें है तेरी कि,
सब कुछ तेरा हो गया है आजकल।
बहुत ख़ूबसूरत है तू, जानती है तू,
पर सब से कह रहा हूँ मैं आजकल।
दीवाना बन फिरता हूँ इधर उधर,
कहते हैं सभी बावरा हो गया हूँ आजकल।
खुशियों का मेरी एक ही ठिकाना है अब,
गलियों से तेरी बार बार गुज़रता हूँ आजकल।
दिल नादाँ मेरा बहक गया है इस तरह कि ,
अक्स में भी अपने तुझे ही देखता हूँ आजकल।
मोहब्बत में तेरी डूब गया हूँ इतना कि,
तसवीरें भी तेरी बोलती हैं आजकल।
खफा हम भी होते तो हैं
"खफा हम भी होते तो हैं" पर आज खफा नहीं आज खुश हूँ। ये मेरी 50th पोस्ट है मेरे ब्लॉग पर।
Golden Jubilee मना रहा हूँ आज... :)
बात यह है कि हम तुमसे कहते नहीं,
वरना खफा हम भी कभी होते तो हैं।
उठता नहीं धुंआ, ना राख ही बचती है ,
जज़्बात इस दिल के भी जलते तो हैं।
रोके रखते हैं ख़ुद को हम हर दफा,
पर अरमान कई मचलते तो हैं।
माना बहाने बेशुमार हैं पास तुम्हारे,
दूर जाने से पहले कदम रुकते तो हैं।
अब वादों की फितरत हम क्या कहें,
एक बार बनकर कई बार टूटते तो हैं।
ऐसा नहीं की अकेले हो तुम ही अकेले,
तन्हाई को हम भी महसूस करते तो हैं।
बात ये है की हम तुमसे कहते नहीं,
यादों में तुम्हारी अक्सर हम भी रोते तो हैं।
आदत
कोशिश थी हवाओं की
हमें पत्तों की तरह उडाने की,
साजिश थी ज़माने की
हमें हर वक्त आजमाने की,
साथ किसी का मिल न सका कभी,
पर आदत हमारी थी हर बार जीत जाने की.
यकीन था ख़ुद पर,
कुछ कर गुजरने की ठानी थी,
दीवानगी जो थी मंजिल को पाने की,
उसे जूनून अपना बनाने की
आदत हमारी थी.
राह जो चुनी थी हमने अपनी,
हर मोड़ पर मिली मुश्किलों की सौगात थी,
हर छोर पर गुलशन खिला दिए हमने,
कांटो से भी यारी की,
आदत हमारी थी.
ढल चुका था सूरज,
अब चाँद से मुलाक़ात की बारी थी,
ख्वाब जो देखे थे इन बंद आंखों ने,
हकीक़त उन्हें बनाने की,
आदत हमारी थी.
हमें पत्तों की तरह उडाने की,
साजिश थी ज़माने की
हमें हर वक्त आजमाने की,
साथ किसी का मिल न सका कभी,
पर आदत हमारी थी हर बार जीत जाने की.
यकीन था ख़ुद पर,
कुछ कर गुजरने की ठानी थी,
दीवानगी जो थी मंजिल को पाने की,
उसे जूनून अपना बनाने की
आदत हमारी थी.
राह जो चुनी थी हमने अपनी,
हर मोड़ पर मिली मुश्किलों की सौगात थी,
हर छोर पर गुलशन खिला दिए हमने,
कांटो से भी यारी की,
आदत हमारी थी.
ढल चुका था सूरज,
अब चाँद से मुलाक़ात की बारी थी,
ख्वाब जो देखे थे इन बंद आंखों ने,
हकीक़त उन्हें बनाने की,
आदत हमारी थी.
मंज़र बदल गया है कोई...
ये मेरे जज़्बात हैं,
इन्हें पढ़ गया है कोई,
कोई आया था यहाँ चुपके से,
क़दमों के निशाँ इस दिल पे,
छोड़ गया है कोई।
अजनबी था वो कोई,
अपना बना गया है कोई,
आहें उठा करती थी कभी,
अब धड़कनें दे गया है कोई।
आसुओं को बारिश बना गया है कोई,
बंज़र ज़िन्दगी का मंज़र बदल गया है कोई,
खुश्क होती थी धड़कनें सभी,
अब उन्हें खुश कर गया है कोई।
सासों को सात सुरों में पिरो गया है कोई,
जज्बातों को आवाज़ बना गया है कोई,
उठती गिरती नज़्म होती थी अक्सर,
उन्हें संभालने को लफ्ज़ दे गया है कोई।
वो आहटें थी उसके आने की या,
जाते-जाते दुआएं दे गया है कोई,
वो निशाँ क़दमों के निशानी थी उसकी या,
मंजिल की राहें बता गया है कोई।
रुका ना वो मेरे लिए,
वादा भी ना किया कोई,
पढ़कर जज़्बात मेरे,
मंज़र ज़िन्दगी का बदल गया है कोई।
इन्हें पढ़ गया है कोई,
कोई आया था यहाँ चुपके से,
क़दमों के निशाँ इस दिल पे,
छोड़ गया है कोई।
अजनबी था वो कोई,
अपना बना गया है कोई,
आहें उठा करती थी कभी,
अब धड़कनें दे गया है कोई।
आसुओं को बारिश बना गया है कोई,
बंज़र ज़िन्दगी का मंज़र बदल गया है कोई,
खुश्क होती थी धड़कनें सभी,
अब उन्हें खुश कर गया है कोई।
सासों को सात सुरों में पिरो गया है कोई,
जज्बातों को आवाज़ बना गया है कोई,
उठती गिरती नज़्म होती थी अक्सर,
उन्हें संभालने को लफ्ज़ दे गया है कोई।
वो आहटें थी उसके आने की या,
जाते-जाते दुआएं दे गया है कोई,
वो निशाँ क़दमों के निशानी थी उसकी या,
मंजिल की राहें बता गया है कोई।
रुका ना वो मेरे लिए,
वादा भी ना किया कोई,
पढ़कर जज़्बात मेरे,
मंज़र ज़िन्दगी का बदल गया है कोई।
Sweeet Friends...
Posted by
Puneet Sahalot
on Monday, February 16, 2009
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Mother's love
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Puneet Sahalot
on Sunday, February 15, 2009
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My Drawings
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ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए
अब प्यार क्या होता है... ये तो प्यार करने वाले ही जाने.... हम तो पूर्ण रूप से अनजान है इससे... एक दिन में सारा प्यार कैसे उमड़ कर आता है। ये भी प्यार करने वालों की ही काबिलियत है। आख़िर हर इंसान का कोई न कोई छुपा हुआ talent ज़रूर होता है। ये दिन ख़ास आशिक मिजाज़ लोगों का दिन है। आज के दिन वो अपना talent दिखने में कतई नहीं हिचकिचाते। Life time validity वाला प्यार आज unlimited रूप से छलक छलक कर रोम रोम से फूट पड़ता है। उस पर भी हम कोई सवाल नहीं उठा सकते। आख़िर बिना अनुभव के अपने आप को तीस-मारखां समझना बेवकूफी ही होगी। और ऐसी कोई गुस्ताखी कहीं किसी सर फिरे आशिक को पसंद ना आए तो समझ लो कि आज प्यार वाले दिन भगवन को प्यारे होने की Probability 100% हो गई। अब इन सब से बचने का सीधा सरल उपाय हमें यही सूझा कि एक डूबकी प्यार में लगा कर कुछ लिख दें... तो वो ही रचना यहाँ पेश कर रहा हूँ... ('रचना' मेरी कविता को कहा है। 'कविता' भी जो मेने लिखा है वो है। कोई लड़की नहीं। अब प्यार वाले दिन सब matter all clear होना चाहिए इसलिए इतना कुछ लिखना पड़ा...)
खामोशी को मेरी समझे गर ,
तो कहूँ तुझसे मोहब्बत है,
जो निगाहों से कह जाए,
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।
बात जो करे गर तो
धड़कनें ख़ुद खामोश हो
तुझे सुनने को बेताब नज़र आयें,
तू जो देखे मुझे गर
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।
खिलती धूप में ढूँढूं तुझे
या चांदनी रात में तू मिल जाए,
हाथों में हाथ चलूँ मैं,
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए.
हवाओं से कह दूँ मैं,
जुल्फों को तेरी न छेड़े यूँ,
जो सवारूँ मैं उन्हें,
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।
ओस की बूंदें भी अब तो
बारिशों सा खुबसूरत एहसास दे जाए,
पत्तो की सर-सराहट सी आहटें हो तेरी
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।
तेरा साथ मिल जाए गर मुझे
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' हो जाए।
उप राष्ट्रपति जी को हिन्दी सीखाइये
वैसे टेलीविजन से चिपके रहने का मुझे कोई शौक नहीं है। एक तो पहले से कोई केबल कनेक्शन नही, दूरदर्शन ही चलता है वो भी खुदा की रहमत से बिना एंटिना के। और फ़िर ना ही ऐसी कोई ख्वाइश उठती है मन में की आज रात को बस ये वाला सीरियल देखना ही है। या वो वाली पिक्चर । ना ही क्रिकेट के प्रति कोई दीवानगी है । कल संयोग से दोपहर का भोजन करते वक्त बस ऐसे ही Remote पर हाथ पड़ गया। सो देखने बैठ गए। अब जनाब दूरदर्शन है तो ज़्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं रखते कि दोपहर के वक्त कोई 75mm का cinema हमें अपने छोटे से 21 inch के टेलीविजन पर देखने को मिलेगा। फ़िर भी बैठ गए सो बैठ गए देखने।
नज़ारा कुछ ऐसा था... हमारे देश की राष्ट्रपति जी श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल दोनों सदनों को संबोधित कर रही थी (अंग्रेजी में) । उनका संबोधन समाप्त हुआ तो फ़िर उप राष्ट्रपति जी माइक पर पधारे । अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करने हेतु। अब पूरा का पूरा भाषण तो फ़िर से देने में वक्त जायर नहीं किया जा सकता। आखिर सभी नेता, राज नेता काफ़ी व्यस्त लोग होते है। कईयों को तो सदन में हाजिर होने तक समय नहीं होता । सो उप राष्ट्रपति जी ने भी सीधा shortcut ही पकड़ा। राष्ट्रपति जी के संबोधन का शुरूआती और अन्तिम भाग हिन्दी में सुनाना शुरू किया।
शुरू करने तक तो सब कुछ ठीक था... पर जैसे जैसे आगे पढने लगे तो जो बात हम आपको बताना चाहतें हैं वो भी साथ साथ आगे बढती गई। दर असल हुआ कुछ ऐसे की उन्हें हिन्दी पढने में दिक्कत महसूस हो रही थी। अब हिन्दी बोलते हुए तो हमने कभी गौर नहीं किया । पर आज जब पढ़कर बोलते हुए देखा तो सच कहूँ दंग रह गया। जनाब। उच्चारण की तो जैसे कब्र ही ख़ुद गई। एक दो बार घर से practice कर आते तो शायद कुछ बेहतर पढ़ लेते। क्षमा चाहूँगा 'बेहतर' कह रहा हूँ , 'अच्छा' नहीं। अब भला मैं भी क्या कर सकता हूँ। जो देखा, सुना वो लिख रहा हूँ। अपनी ओर से कोई ingredient नहीं डाला है। मिर्च मसाला भी नहीं है। उनके उच्चारण को देख हैरत में पड़ गया। 'स्तरीय' को 'स्त्रिय' , 'क्षेत्र' को 'शत्र', 'शाश्वत' को 'शाश्व्रत' और भी ढेरों गलतियां... जब 'शाश्वत' को ग़लत पढ़ा तो 'आश्वस्त' से भी कोई उम्मीद रखना बेमानी सी बात है। इतनी गलतियां सुन कर तो बचपन की याद आ गई। शायद तीसरी, चौथी, पांचवी कक्षा में भी इससे तो कुछ बेहतर हिन्दी ही रही होगी। हिन्दी रही हो ना रही हो। पढ़ा तो बेहतर ही होगा। अब स्कूल में तो teacher डांट डपट कर सीखा भी देते थे । नहीं मानते तो कभी कभी punishment का भी लाभ मिल जाता था। इस उम्र में तो इंसान को ख़ुद ही सीख लेना चाहिए। कम से कम एक बार स्वयं ही मंथन कर लेते, विचार विमर्श (जो की हर नेता का सबसे बड़ा गुन होता है) कर लिया होता तो हमें इस तरह कुछ सरे आम कहना नहीं पड़ता। खैर सरे आम तो आपने ही पढ़ा है सब कुछ तो हम क्यूँ भला अपने आप को दोषी ठहराएं....
अब चलते चलते उप राष्ट्रपति जी से यही आग्रह करना चाहूँगा की हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, 'हिन्दी हैं हम...' गीत भी कई बार सुना ही होगा आपने, तो कृपया इसका सम्मान करें, पढने-बोलने में कोई परेशानी होती है तो किसी की सलाह से सही पढ़ें। आप सभी लोग देश को चलाते हैं तो जनता भी आपसे उम्मीदें रखती है। अंग्रेजी के दौर में हिन्दी खोती जा रही है। बाकी नागरिकों का पता नही पर आपके देश का यह नागरिक तो कम से कम आप सभी उच्च पदों पर आसीन सम्माननीय व्यक्तियों से हिन्दी के सही प्रयोग, उपयोग की आशा रखता है। उम्मीद करता हूँ कि अगली बार शायद कुछ 'बेहतर' या फ़िर पूर्ण रूप से सही हिन्दी सुनने को मिलेगी। मैं भी एक आम आदमी हूँ और आम आदमी उम्मीदों का साथ कभी नहीं छोड़ सकता है... उम्मीदों के साहारे ही जीता है। सो मैं भी उम्मीदों कि फेहरिस्त हमेशा तैयार ही रखता हूँ। कभी भी कोई भी पुरी हो जाए तो समझो आज तो भाग खुल गए...
नज़ारा कुछ ऐसा था... हमारे देश की राष्ट्रपति जी श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल दोनों सदनों को संबोधित कर रही थी (अंग्रेजी में) । उनका संबोधन समाप्त हुआ तो फ़िर उप राष्ट्रपति जी माइक पर पधारे । अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करने हेतु। अब पूरा का पूरा भाषण तो फ़िर से देने में वक्त जायर नहीं किया जा सकता। आखिर सभी नेता, राज नेता काफ़ी व्यस्त लोग होते है। कईयों को तो सदन में हाजिर होने तक समय नहीं होता । सो उप राष्ट्रपति जी ने भी सीधा shortcut ही पकड़ा। राष्ट्रपति जी के संबोधन का शुरूआती और अन्तिम भाग हिन्दी में सुनाना शुरू किया।
शुरू करने तक तो सब कुछ ठीक था... पर जैसे जैसे आगे पढने लगे तो जो बात हम आपको बताना चाहतें हैं वो भी साथ साथ आगे बढती गई। दर असल हुआ कुछ ऐसे की उन्हें हिन्दी पढने में दिक्कत महसूस हो रही थी। अब हिन्दी बोलते हुए तो हमने कभी गौर नहीं किया । पर आज जब पढ़कर बोलते हुए देखा तो सच कहूँ दंग रह गया। जनाब। उच्चारण की तो जैसे कब्र ही ख़ुद गई। एक दो बार घर से practice कर आते तो शायद कुछ बेहतर पढ़ लेते। क्षमा चाहूँगा 'बेहतर' कह रहा हूँ , 'अच्छा' नहीं। अब भला मैं भी क्या कर सकता हूँ। जो देखा, सुना वो लिख रहा हूँ। अपनी ओर से कोई ingredient नहीं डाला है। मिर्च मसाला भी नहीं है। उनके उच्चारण को देख हैरत में पड़ गया। 'स्तरीय' को 'स्त्रिय' , 'क्षेत्र' को 'शत्र', 'शाश्वत' को 'शाश्व्रत' और भी ढेरों गलतियां... जब 'शाश्वत' को ग़लत पढ़ा तो 'आश्वस्त' से भी कोई उम्मीद रखना बेमानी सी बात है। इतनी गलतियां सुन कर तो बचपन की याद आ गई। शायद तीसरी, चौथी, पांचवी कक्षा में भी इससे तो कुछ बेहतर हिन्दी ही रही होगी। हिन्दी रही हो ना रही हो। पढ़ा तो बेहतर ही होगा। अब स्कूल में तो teacher डांट डपट कर सीखा भी देते थे । नहीं मानते तो कभी कभी punishment का भी लाभ मिल जाता था। इस उम्र में तो इंसान को ख़ुद ही सीख लेना चाहिए। कम से कम एक बार स्वयं ही मंथन कर लेते, विचार विमर्श (जो की हर नेता का सबसे बड़ा गुन होता है) कर लिया होता तो हमें इस तरह कुछ सरे आम कहना नहीं पड़ता। खैर सरे आम तो आपने ही पढ़ा है सब कुछ तो हम क्यूँ भला अपने आप को दोषी ठहराएं....
अब चलते चलते उप राष्ट्रपति जी से यही आग्रह करना चाहूँगा की हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, 'हिन्दी हैं हम...' गीत भी कई बार सुना ही होगा आपने, तो कृपया इसका सम्मान करें, पढने-बोलने में कोई परेशानी होती है तो किसी की सलाह से सही पढ़ें। आप सभी लोग देश को चलाते हैं तो जनता भी आपसे उम्मीदें रखती है। अंग्रेजी के दौर में हिन्दी खोती जा रही है। बाकी नागरिकों का पता नही पर आपके देश का यह नागरिक तो कम से कम आप सभी उच्च पदों पर आसीन सम्माननीय व्यक्तियों से हिन्दी के सही प्रयोग, उपयोग की आशा रखता है। उम्मीद करता हूँ कि अगली बार शायद कुछ 'बेहतर' या फ़िर पूर्ण रूप से सही हिन्दी सुनने को मिलेगी। मैं भी एक आम आदमी हूँ और आम आदमी उम्मीदों का साथ कभी नहीं छोड़ सकता है... उम्मीदों के साहारे ही जीता है। सो मैं भी उम्मीदों कि फेहरिस्त हमेशा तैयार ही रखता हूँ। कभी भी कोई भी पुरी हो जाए तो समझो आज तो भाग खुल गए...
ज़रूरत थी जब किसी अपने की...
Dedicated to the Life Story of My Parents....
पापा जी... मम्मी जी... आपके लिए....
ज़रूरत थी जब किसी अपने की
मैं खुदा को ढूंढ़ लाया,
तलाश थी मोहब्बत के काफिलों की
ना जाने कहाँ से वो बेवफा चला आया।
झूठे वादे कहीं से ,
कहीं से सिर्फ़ झूठे दिलासे ले आया ,
गया जहाँ कहीं भी, हर दफा,
किसी दगाबाज़ से मिल आया ।
आदत बड़ी बुरी थी यारों,
खुद्दारी से जीने की,
जब कभी बिकता ईमान देखा
तो परदे गिरा आया।
साथ मिलना किसी का तो
नामुमकीन सी बात थी,
मैं अकेला ही हर जंग जीत आया।
हँसते चेहरों के पीछे क्या है,
पता था मुझे,
उन्हें भी मैं हकीक़त के आईने दिखा आया।
गिरा जब कभी किसी का सहारा ना था,
चंद इमारतें क्या खड़ी हुई अमीरी की,
हर कोई दौडा चला आया ।
पैसे को पूछती है दुनिया,
पैसे को पूजती है दुनिया,
कल तक किनारा कर गुज़रता था वो,
आज वो भी अपना बन चला आया।
ज़िन्दगी को देखा है मैंने हर नज़रिए से,
मेरे बुरे दिनों को भुलाकर हर कोई
आज अच्छे दिनों में साथ निभाने चला आया।
अपनेपन का ताज पहने सर पे,
कोई मुझे 'भाई' तो कोई 'बेटा'
और पता नहीं कितने 'अपने से' ही
नामों से पुकारता नज़र आया.....
ज़रूरत थी जब किसी अपने की मैं खुदा को ढूंढ़ लाया....
पापा जी... मम्मी जी... आपके लिए....
ज़रूरत थी जब किसी अपने की
मैं खुदा को ढूंढ़ लाया,
तलाश थी मोहब्बत के काफिलों की
ना जाने कहाँ से वो बेवफा चला आया।
झूठे वादे कहीं से ,
कहीं से सिर्फ़ झूठे दिलासे ले आया ,
गया जहाँ कहीं भी, हर दफा,
किसी दगाबाज़ से मिल आया ।
आदत बड़ी बुरी थी यारों,
खुद्दारी से जीने की,
जब कभी बिकता ईमान देखा
तो परदे गिरा आया।
साथ मिलना किसी का तो
नामुमकीन सी बात थी,
मैं अकेला ही हर जंग जीत आया।
हँसते चेहरों के पीछे क्या है,
पता था मुझे,
उन्हें भी मैं हकीक़त के आईने दिखा आया।
गिरा जब कभी किसी का सहारा ना था,
चंद इमारतें क्या खड़ी हुई अमीरी की,
हर कोई दौडा चला आया ।
पैसे को पूछती है दुनिया,
पैसे को पूजती है दुनिया,
कल तक किनारा कर गुज़रता था वो,
आज वो भी अपना बन चला आया।
ज़िन्दगी को देखा है मैंने हर नज़रिए से,
मेरे बुरे दिनों को भुलाकर हर कोई
आज अच्छे दिनों में साथ निभाने चला आया।
अपनेपन का ताज पहने सर पे,
कोई मुझे 'भाई' तो कोई 'बेटा'
और पता नहीं कितने 'अपने से' ही
नामों से पुकारता नज़र आया.....
ज़रूरत थी जब किसी अपने की मैं खुदा को ढूंढ़ लाया....
I can't love you anymore
Posted by
Puneet Sahalot
on Friday, February 6, 2009
Labels:
English Poem,
Poem
/
Comments: (3)
I have loved you a lot,
But I am sorry,
I can't love you anymore.
I want you to be my forgotten past,
I want you to be my puzzle's lost part,
I want you to be the broken star.
I don't wish to break your heart,
I simply want you to apart,
I don't want you to miss me again,
I simply want you to walk away,
I don't want you to be mine,
I simply want to live without the dreamy nights.
I can't see tears in your glittering eyes,
I can't see your pleasant smile turn into cries.
I can't find a 'Reason' to love you like before,
That's the only reason,
I can't love you any more.
But I am sorry,
I can't love you anymore.
I want you to be my forgotten past,
I want you to be my puzzle's lost part,
I want you to be the broken star.
I don't wish to break your heart,
I simply want you to apart,
I don't want you to miss me again,
I simply want you to walk away,
I don't want you to be mine,
I simply want to live without the dreamy nights.
I can't see tears in your glittering eyes,
I can't see your pleasant smile turn into cries.
I can't find a 'Reason' to love you like before,
That's the only reason,
I can't love you any more.
You will be in love...
Posted by
Puneet Sahalot
on Sunday, February 1, 2009
Labels:
English Poem,
Poem
/
Comments: (8)
Its a dream today,
but I know dream has to
come true someday.
I don't know when will it be,
tomorrow or today,
But I believe,
You will be in love with me someday.
It will be your desire
to hold me in your arms,
and wish that we never apart.
I know you will gaze at me
as if you would never see me again,
You wish to take away my picture
in your heart and look at it
whenever it says.
Your eyes speak
What you never wish to say,
I don't know when will it be,
tomorrow or today,
But I believe,
You will be in love with me someday....
but I know dream has to
come true someday.
I don't know when will it be,
tomorrow or today,
But I believe,
You will be in love with me someday.
It will be your desire
to hold me in your arms,
and wish that we never apart.
I know you will gaze at me
as if you would never see me again,
You wish to take away my picture
in your heart and look at it
whenever it says.
Your eyes speak
What you never wish to say,
I don't know when will it be,
tomorrow or today,
But I believe,
You will be in love with me someday....
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