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ये शहर....


जीती जागती ज़िन्दगी को दफनाता ये शहर,
हर मुफलिस को अमीरी के ख्वाब दिखाता ये शहर.

हकीक़त से कोसों दूर है गलियाँ इसकी,
हर किसी को उम्मीदों के पुल बंधाता ये शहर.

न उगते सूरज की परवाह इसे, न ढलती शाम की,
अंधेरे उजालों, उजालों अंधेरों में भागता ये शहर.

चीखुं, चिल्लाऊं, कहानी किसे अपनी सुनाऊं,
भीड़ में गुमनाम बनाता ये शहर.

ऊँची - ऊँची इमारतों के बीच,
दिल के रास्तों को तंग बनाता ये शहर.

ना पडौस यहाँ पे , ना कोई चबूतरा,
गाँव की याद में हर वक्त रुलाता ये शहर.

ना कोई गली अपनी, ना कोई मौहल्ला,
केवल सड़कों से मुलाकात करवाता ये शहर.

ना चाची की डांट यहाँ पे, ना बच्चों की शैतानी,
हर पल प्यार के लिए तरसाता ये शहर.

बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में आता है हर शख्स,
जीती जागती ज़िन्दगी को दफनाता ये शहर.

1 comments:

QUIETUDE N said...

bahut acha likha hai!!
well done!!

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