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बस तुझे ही देखा है...

चाहा जिधर, उधर बस तुझे ही देखा है,
प्यार इतना जो आता है
तुझ पर, तो क्या मैं करूँ,
कहाँ तूने भी ख़ुद पर कोई काबू रखा है |

कभी दिल में छुपाता हूँ तुझे, 
कभी निगाहों ने मेरी 
ये मुझसे कहा है,
मैंने तुझे 'नज़र' बना रखा है | 


हसरतों का जहाँ तूने नहीं देखा,
चाहतें हैं कितनी,
कैसे बताता तुझे,
हर अरमान तो अभी दिल में दबा रखा है

कहानी ये कैसे बयां करूँ,
जो ख़त्म ना होती हो
उसे शुरू कहाँ से करूँ,
खुदा ने इसी का नाम तो 'मोहब्बत' रखा है |

4 comments:

अभिन्न said...

khuda ne isi ka naam to muhabbat rakha hai......vaah kya andaz hai,deep thots

प्रकाश बादल said...

तुम जितने छोटे हो तुम्हारी कविता उससे कहीं अधिक गंभीर ! इसीलिए तो तुम्हारा फैन हूँ भाई ! कैसे हो ! मैं पिछले दिनों बहुत परेशान रहा तो तुमसे बात न हो सकी ! जीओ !!!

QUIETUDE N said...

quite a profound thught!!
happy diwali.

sunilbhatt said...

bahut khoob

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