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सफर ये आखिरी और पहला हो

हाथों में हाथ,
संग मैं चलूँ तेरे,
सफर ये कभी ख़त्म ना हो।
ना मैं रुकूँ,
रुके ना तू,
बस खामोशी, बातों,
वादों का सिलसिला हो।

संग तू और मैं चलते रहें,
फ़िर चाहे शाम ढले,
या सवेरा खिले,
देखे चन्दा हमें,
या देख हमें सूरज जले,
हमें किसी की परवाह न हो।

संग तू और मैं चलें कुछ इस तरह,
सफर ये आखिरी और पहला हो।

किसी से शिकायत क्या करूँ..

किसी से शिकायत क्या करू मैं
मुझे तो अपनों ने ही धोखा दिया,
दुआ करता रहा सबकी खुशियों की मैं,
शायद मैंने यही गुनाह किया.....

:(
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