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आई हो जब से तुम

can't resist much... so m back... :)

आई हो जब से तुम ज़िन्दगी में मेरी,
जहां मेरा जन्नत हो रहा है।
क्या कहूँ तुमसे, कि किस कदर,
दिल ये पागल हो रहा है।

बहकता है कभी, कभी मचलता है,
ठिठक - ठिठक कर चलता है,
मिली हो जो तुम इसे, इस तरह,
ख़ुद पर गुमान सा हो रहा है।

बावरा हो गया है ये आजकल,
कभी फलक पर नाम तुम्हारा,
कभी रातों में तुम्हें चाँद सा लिख रहा है।

अरमान इसके जानूं ना मैं,
जज्बातों का कहाँ कोई ठिकाना है,
बच कर रहना इससे तुम ज़रा,
निगाहों में तुम्हारी इसे,
मयखाना दिख रहा है।

सुरूर मोहब्बत का
चढ़ रहा है अभी - अभी,
होश धीरे - धीरे गुम हो रहा है,
क्या कहूँ तुमसे, कि किस कदर,
दिल ये पागल हो रहा है।

7 comments:

Priya Joyce said...

am not able to read it..donno y hindi appears as squares :P

and chrome doesn't support translation too :(

Puneet Sahalot said...

hey... thats d prblm with browser..
use iexplorer/firefox/opera

well... i use chrome too.. n it shows everything correctly :)

MUFLIS said...

achhi rachna hai
jaise mn ki parvaaz
aasmaan chhoo
lena chahti ho....
badhaaee .
---MUFLIS---

Pyaasa Sajal said...

dil se likhi gayi rachna...good hai

www.pyasasajal.blogspot.com

"अर्श" said...

UMRA HAI UNMAAD HAI UFAK SE DUR JAANE KO ...
YE HAUSALAA LE JAAYEGA TUMHE AASMAAN LAANE KO ...


ARSH

प्रकाश बादल said...

बहुत अच्छे ! लिखते रहो और तुमने शायद मेरी सलाह पर भी ग़ौर किया होगा?

Maya (Nand) Jha said...

khoobsurat hai :). ek correction: I guess you wanted to tell: 'maykhana dikh raha hai'.

bahut dino baad tumhare blog pe aaya. good to see that you are back to writing. Keeping a good balance is an art which everybody learns as he/she moves in life. Good luck!

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