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आई हो जब से तुम

can't resist much... so m back... :)

आई हो जब से तुम ज़िन्दगी में मेरी,
जहां मेरा जन्नत हो रहा है।
क्या कहूँ तुमसे, कि किस कदर,
दिल ये पागल हो रहा है।

बहकता है कभी, कभी मचलता है,
ठिठक - ठिठक कर चलता है,
मिली हो जो तुम इसे, इस तरह,
ख़ुद पर गुमान सा हो रहा है।

बावरा हो गया है ये आजकल,
कभी फलक पर नाम तुम्हारा,
कभी रातों में तुम्हें चाँद सा लिख रहा है।

अरमान इसके जानूं ना मैं,
जज्बातों का कहाँ कोई ठिकाना है,
बच कर रहना इससे तुम ज़रा,
निगाहों में तुम्हारी इसे,
मयखाना दिख रहा है।

सुरूर मोहब्बत का
चढ़ रहा है अभी - अभी,
होश धीरे - धीरे गुम हो रहा है,
क्या कहूँ तुमसे, कि किस कदर,
दिल ये पागल हो रहा है।
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