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ज़माने सा बनाया होता मुझे

ऐ खुदा मेरे क्यों नासमझ बनाया तुने मुझे,
थोडी सी दुनियादारी भी सिखा जाता मुझे।

थोड़ा बेईमान, मक्कार, एहसान फरामोश बना कर,
दुनिया की नज़रों में उठा कर,
इस ज़माने सा बनाया होता मुझे।

किस तरह शब्दों को गुंथा जाता है,
बातों से दिल लोगों का लूटा जाता है,
ऐसा कोई हुनर सिखाया होता मुझे।

सच बोलना तो आता है मुझे,
झूठ किस तरह छुपाया जाता है,
कोई बहाना बताया होता मुझे।

कई होते मुझ पर भी फ़िदा,
जी न सकते कभी वो मेरे बिना,
रिश्तों से खेलना सिखाया होता मुझे।

इंसान बना दिया मुझे तुने,
थोड़ा झूठा, फरेबी, आदमी सा बनाया होता मुझे,
कोई शिकायत न होती मुझे तुझसे,
जो औरों सा बनाया होता मुझे।

4 comments:

SWAPN said...

achcha likh rahe ho puneet, likhte raho.

SWAPN said...

achcha likh rahe ho puneet, likhte raho.

"अर्श" said...

kaafi mehnat kari hai tumne... din-b-din achha kar rahe ho... ye rachanaa khaasa aachee lagi..upar waale ko mat koso har chij tumne duniya sikhaa degi... abhi umra nahi hui hai isliye aisi baat hai nahi to...mera manana hai ke ... duniya is tarah se jaalim hai ke maut bhi kisto me milti hai isase..


jaari rakho likhna ...

arsh

Babli said...

बहुत ही खुबसूरत लिखा है आपने !

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