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जाने क्या सोच रही थी

आज वो कुछ

ख़ुद में ही खोयी हुई सी थी,

खामोश सी थी, बैठी चुपचाप,

जाने क्या सोच रही थी,

पर आज वो,

हर रोज़ से भी ज़्यादा

खुबसूरत लग रही थी।


बैठी थी वो नज़रें झुकाए,

शायद कोई ख्वाब बुन रही थी,

कुछ हसीं पल के,

आने वाले कल के,

जाने क्या सोच रही थी,

पर आज वो,

हर रोज़ से भी ज़्यादा

खुबसूरत लग रही थी।


मैं एक टक देख रहा था उसे,

वो ज़मीन को देख रही थी,

सितारों को छूने की सोच रही थी,

कोई ख्वाहिश दबी,

जैसे उठ रही थी,

जाने क्या सोच रही थी,

पर आज वो,

हर रोज़ से भी ज़्यादा

खुबसूरत लग रही थी।


1 comments:

Babli said...

आप का ब्लोग मुझे बहुत अच्छा लगा और आपने बहुत ही सुन्दर लिखा है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

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