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ज़माने सा बनाया होता मुझे


ऐ खुदा मेरे क्यों नासमझ बनाया तुने मुझे,
थोडी सी दुनियादारी भी सिखा जाता मुझे।

थोड़ा बेईमान, मक्कार, एहसान फरामोश बना कर,
दुनिया की नज़रों में उठा कर,
इस ज़माने सा बनाया होता मुझे।

किस तरह शब्दों को गुंथा जाता है,
बातों से दिल लोगों का लूटा जाता है,
ऐसा कोई हुनर सिखाया होता मुझे।

सच बोलना तो आता है मुझे,
झूठ किस तरह छुपाया जाता है,
कोई बहाना बताया होता मुझे।

कई होते मुझ पर भी फ़िदा,
जी न सकते कभी वो मेरे बिना,
रिश्तों से खेलना सिखाया होता मुझे।

इंसान बना दिया मुझे तुने,
थोड़ा झूठा, फरेबी, आदमी सा बनाया होता मुझे,
कोई शिकायत न होती मुझे तुझसे,
जो औरों सा बनाया होता मुझे।

har insaan me kuch na kuch kami zarur hoti hai... bt M not that bad yaar... :)

Bye to all.... n my blog....
Wish u all loads of happiness n success... :))

Regards
Puneet Sahalot...

ख्वाहिशें

कुछ रुकी रुकी सी आवाजें हैं,
सुन ले तू मेरे बिन कहे,
बड़ी नहीं कोई,
छोटी छोटी सी मेरी ख्वाहिशें हैं।

सोचता हूँ कभी करीब हो तू मेरे,
मैं कहता रहूँ, तू सुनती रहे,
ज़रा ज़रा सा मुस्कुरा दे बातों पे मेरी,
ऐसी कुछ हसरतें हैं।

मैं चलूँ जो अलग तुझसे
तू साथ मेरे रहे,
दुनिया से अलग पहचाने मुझे,
ऐसी कुछ चाहतें हैं।

कभी बदला है तुने मुझे,
कभी सिखाया है कुछ,
गिर गिर कर जो उठा हूँ मैं,
सब तेरी इनायतें हैं।

इंतज़ार करता हूँ अक्सर मैं तेरा,
तू आएगी कभी,
पर आती मुझ तक सिर्फ़,
तेरे लौट जाने की आहटें हैं।

कभी पल भर की खुशी है मेरी,
कभी रुलाती तेरी यादें हैं,
ज़िन्दगी है यही,
पल पल में बदलती करवटें हैं।

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जाने क्या सोच रही थी

आज वो कुछ

ख़ुद में ही खोयी हुई सी थी,

खामोश सी थी, बैठी चुपचाप,

जाने क्या सोच रही थी,

पर आज वो,

हर रोज़ से भी ज़्यादा

खुबसूरत लग रही थी।


बैठी थी वो नज़रें झुकाए,

शायद कोई ख्वाब बुन रही थी,

कुछ हसीं पल के,

आने वाले कल के,

जाने क्या सोच रही थी,

पर आज वो,

हर रोज़ से भी ज़्यादा

खुबसूरत लग रही थी।


मैं एक टक देख रहा था उसे,

वो ज़मीन को देख रही थी,

सितारों को छूने की सोच रही थी,

कोई ख्वाहिश दबी,

जैसे उठ रही थी,

जाने क्या सोच रही थी,

पर आज वो,

हर रोज़ से भी ज़्यादा

खुबसूरत लग रही थी।


ज़माने सा बनाया होता मुझे

ऐ खुदा मेरे क्यों नासमझ बनाया तुने मुझे,
थोडी सी दुनियादारी भी सिखा जाता मुझे।

थोड़ा बेईमान, मक्कार, एहसान फरामोश बना कर,
दुनिया की नज़रों में उठा कर,
इस ज़माने सा बनाया होता मुझे।

किस तरह शब्दों को गुंथा जाता है,
बातों से दिल लोगों का लूटा जाता है,
ऐसा कोई हुनर सिखाया होता मुझे।

सच बोलना तो आता है मुझे,
झूठ किस तरह छुपाया जाता है,
कोई बहाना बताया होता मुझे।

कई होते मुझ पर भी फ़िदा,
जी न सकते कभी वो मेरे बिना,
रिश्तों से खेलना सिखाया होता मुझे।

इंसान बना दिया मुझे तुने,
थोड़ा झूठा, फरेबी, आदमी सा बनाया होता मुझे,
कोई शिकायत न होती मुझे तुझसे,
जो औरों सा बनाया होता मुझे।

मेरी-तुम्हारी कोई तो कहानी है



मैं अक्सर सुनता हूँ, कि तुम ये कहती हो,
मेरी-तुम्हारी कोई तो कहानी है,
जो मोहब्बत कि है, तो छोटी सी है,
जुदाई के पल-पल में सदियाँ बितानी है।

मेरी सुकून की राहों से अक्सर तुम गुज़रती हो,
राहें ज़िन्दगी कि भी अब तुम्हारी है,
कट जाए ये सफर, कब क्या ख़बर,
अभी तो हर वक्त अजब सी खुमारी है।

तुम अक्सर मेरा इंतज़ार करती हो,
इसमे छुपी ज़रूर कोई बेकरारी है,
जो इंतज़ार है, बेकरारी है, खुमारी है,
तो यकीनन ये मोहब्बत की ही कहानी है।

ये शहर

जीती जागती ज़िन्दगी को दफनाता ये शहर,
हर मुफलिस को अमीरी के ख्वाब दिखाता ये शहर.

हकीक़त से कोसों दूर है गलियाँ इसकी,
हर किसी को उम्मीदों के पुल बंधाता ये शहर.

न उगते सूरज की परवाह इसे, न ढलती शाम की,
अंधेरे उजालों, उजालों अंधेरों में भागता ये शहर.

चीखुं, चिल्लाऊं, कहानी किसे अपनी सुनाऊं,
भीड़ में गुमनाम बनाता ये शहर.

ऊँची - ऊँची इमारतों के बीच,
दिल के रास्तों को तंग बनाता ये शहर.

ना पडौस यहाँ पे , ना कोई चबूतरा,
गाँव की याद में हर वक्त रुलाता ये शहर.

ना कोई गली अपनी, ना कोई मौहल्ला,
केवल सड़कों से मुलाकात करवाता ये शहर.

ना चाची की डांट यहाँ पे, ना बच्चों की शैतानी,
हर पल प्यार के लिए तरसाता ये शहर.

बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में आता है हर शख्स,
जीती जागती ज़िन्दगी को दफनाता ये शहर.

ज़िन्दगी है यही कि जीता रहूँ

ज़िन्दगी है यही कि जीता रहूँ,
मरने से पहले,
शायद पूरे कभी कोई अरमान होंगे।

चुरा लाया हूँ खुशियाँ थोडी सी
जाने कहीं से,
पर कहाँ उनमें कोई जज़्बात होंगे।

उलझा हूँ इधर उधर की उलझनों में ,
कभी सुलझ जाए,
तो ज़िन्दगी के साज़ होंगे।

बात मेरी भी सुने कोई,
ज़रा सी है,
लफ्ज़ मेरे कोई इस लायक तो होंगे।

बडबडाता हूँ अक्सर अकेले मैं,
उम्मीद है मुझे,
ये खामोशियों को तोड़ते होंगे।

रुख दिख गया है हवाओं का,
अभी से मुझे,
रास्ते अपने मुझे बदलने होंगे।

चलना है अब सिर्फ़ मुझे ही मुझे,
राहों में मेरी,
किन्हीं क़दमों के निशां भी ना होंगे।

साथ निभाना न आए किसी को,
पर यकीनन कभी,
साथ छोड़ने में कोई मजबूर न होंगे।
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