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खिलती सुबह ढलती शाम
की तरह तू मासूम है,
इठलाती घटाओं, लहराती हवाओं
की तरह तू बड़ी नादाँ है।
तारीफ़ क्या करूँ ज़माने से तेरी,
तू अपने आप में ही कुछ ख़ास है।

निघाहों में तेरी कशिश है अजब सी,
हंसीं तेरी एक प्यार भरा जाम है,
महकती है फ़िज़ायें साँसों से तेरी,
धड़कनें तेरी हर गीत का साज़ है।

तन्हाई में मेरी आज कल
बातें तेरी आम हैं,
हर लफ्ज़, हर दुआ में मेरी
बस एक तेरा ही नाम है।

खुशियाँ मिले ज़माने भर की तुझे,
खुश रहे तू उम्र भर,
बस यही एक ख्वाब, हसरत, फरियाद है।

ऐ यार मेरे, अब जुदा न होना, तू मुझसे,
इस पत-झड़ की तू ही एक बहार है....

3 comments:

SWAPN said...

achcha hai achcha hai, lage raho punni bhai.

Krishna Patel said...

bahut khub.kya baat hai.aapki dosti lajawaab hai.

प्रकाश बादल said...

निघाहों में तेरी कशिश है अजब सी,
हंसीं तेरी एक प्यार भरा जाम है,
महकती है फ़िज़ायें साँसों से तेरी,
धड़कनें तेरी हर गीत का साज़ है।

इन पंक्तियों में कहीं वर्तनी की ग़लती है, तलाश करो और मिल जाए तो सुधार भी देना। कविता अच्छी लगी। तुम्हारे दोस्त के लिए तुमने लिखी है तो अच्छी है लेकिन मेरा सुझाव ये भी रहेगा कि दाल-रोटी से जुड़ी कविताएं लिखने पर भी ज़ोर दो।

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