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खामोश रहता हूँ



किसी से बात करूँ मैं
मेरा दिल करता नहीं ,
लिखूं भी तो क्या लिखूं,
अरमां कोई मचलता नहीं,
खामोश रहता हूँ अब मैं अक्सर ,
शोरगुल भी इस दुनिया का
मुझे तंग करता नहीं।


हैरान होता हूँ इन हर पल
बदलते चेहरों को देख कर,
जिन रास्तों पे घर हैं उनका
जो हकीक़त से नज़रें चुराते हैं,
उन गलियों से अब मैं गुज़रता नहीं,
खामोश रहता हूँ अब मैं अक्सर ,
शोरगुल भी इस दुनिया का
मुझे तंग करता नहीं।


सोचता हूँ किस तरह लोग
फरेबी बन जाते हैं,
झूठ को भी सच और
सच को भी झूठ बताते हैं ,
अब उनसे कोई सवालात मैं करता नहीं,
खामोश रहता हूँ अब मैं अक्सर,
शोरगुल भी इस दुनिया का
मुझे तंग करता नहीं।

2 comments:

SWAPN said...

ARE TUM TO YOGI BANTE JA RAHE HO, YE TO YOGION KE SAARE LAKSHAN HAI.

PUNEET ACHHI BHAVABHIVYAKTI HAI. LIKHTE RAHEN.NIRASHA KI BHAVNAON KO NIKALEN, WO JO JOSHILE POSITIVE THINKING KI RACHNA LIKHI THI USKO YAAD KAREN.

प्रकाश बादल said...

बहुत खूब अभिव्यक्ति की नदी को बहने दो। ये रचना भी अच्छी है।

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