मुझसे शायद कोई खता सी हो गई है,
खुशियाँ मेरी मुझसे खफा सी हो गई है।
जज़्बात भी साथ देते नहीं आज कल,
क्या ख़बर बहुत बड़ी भूल सी हो गई है।
रो देता हूँ अब महफिलों में भी अक्सर,
गम में डूब जाने की आदत सी हो गई है।
झूठे वादे ही मिले है अब तक मुझे,
हकीक़त तो ग़लत फ़हमी सी हो गई है।
दिलासे भी मिले मुफ्त में कई मुझे,
दुआ भी सब दिखावे सी हो गई है।
कोई रिश्ता न रहा यहाँ अब रिश्तों में,
साथ निभाने की बात बेमानी सी हो गई है।
मौत मिलती भी है तो यहाँ किश्तों में,
ज़िन्दगी किसी 'हादसे' की निशानी सी हो गई है।
दर्द झलकता नहीं है कभी इस तरह,
आज सब्र के बाँध की दीवारें टूट सी गई हैं।
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6 comments:
wow! puneet its really very touchy man u r doing good job.
दिलासे भी मिले मुफ्त में कई मुझे,
दुआ भी सब दिखावे सी हो गई है।
हकीकत को ज़बान देती हुई रचना..
मौत मिलती भी है तो यहाँ किश्तों में,
ज़िन्दगी किसी 'हादसे' की निशानी सी हो गई है।
भाया इतनी से उम्र में इतने दर्दों का अहसास, साथ ही प्रस्तुति भी दमदार , लगता है बड़े होकर बड़े शायर जरूर बनोगे.
हमारी हार्दिक शुभकामनाएं हैं आपके साथ................
चन्द्र मोहन गुप्त
मौत मिलती भी है तो यहाँ किश्तों में,
ज़िन्दगी किसी 'हादसे' की निशानी सी हो गई है।
badhia puneet , aaj to dard hi dard mehsoos kar raha hun, but rachna men baat hi kuchh aur hai.
so profoundly true!!!
वाह ! पुनीत वाह!
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