Theme Preview Rss

ज़िन्दगी है यही कि जीता रहूँ

ज़िन्दगी है यही कि जीता रहूँ,
मरने से पहले,
शायद पूरे कभी कोई अरमान होंगे।

चुरा लाया हूँ खुशियाँ थोडी सी
जाने कहीं से,
पर कहाँ उनमें कोई जज़्बात होंगे।

उलझा हूँ इधर उधर की उलझनों में ,
कभी सुलझ जाए,
तो ज़िन्दगी के साज़ होंगे।

बात मेरी भी सुने कोई,
ज़रा सी है,
लफ्ज़ मेरे कोई इस लायक तो होंगे।

बडबडाता हूँ अक्सर अकेले मैं,
उम्मीद है मुझे,
ये खामोशियों को तोड़ते होंगे।

रुख दिख गया है हवाओं का,
अभी से मुझे,
रास्ते अपने मुझे बदलने होंगे।

चलना है अब सिर्फ़ मुझे ही मुझे,
राहों में मेरी,
किन्हीं क़दमों के निशां भी ना होंगे।

साथ निभाना न आए किसी को,
पर यकीनन कभी,
साथ छोड़ने में कोई मजबूर न होंगे।

3 comments:

SWAPN said...

jeete raho.

Neha Maheshwari said...

bahut mast

प्रकाश बादल said...

आप में लेखन की अपार संभावनाएं हैं और आपने अभी तक हो सकता है मेरा सुझाव न माना हो??? आपकी ये कविता भी आपकी भीतर की उथल-पुथल को बयान कर रही है वाह!

Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin