मोहब्बत में तेरी डूब गया हूँ इतना कि,
तसवीरें भी तेरी बोलती हैं आजकल।
बैठे बैठे बतियाता हूँ उन्हीं से कि,
तुझे सोच सोच पगलाता हूँ आजकल।
रह रहा हूँ मैं यादों में तेरी कि,
रह रही है तू मुझ में आजकल।
मैं मानूं ये सौगातें है तेरी कि,
सब कुछ तेरा हो गया है आजकल।
बहुत ख़ूबसूरत है तू, जानती है तू,
पर सब से कह रहा हूँ मैं आजकल।
दीवाना बन फिरता हूँ इधर उधर,
कहते हैं सभी बावरा हो गया हूँ आजकल।
खुशियों का मेरी एक ही ठिकाना है अब,
गलियों से तेरी बार बार गुज़रता हूँ आजकल।
दिल नादाँ मेरा बहक गया है इस तरह कि ,
अक्स में भी अपने तुझे ही देखता हूँ आजकल।
मोहब्बत में तेरी डूब गया हूँ इतना कि,
तसवीरें भी तेरी बोलती हैं आजकल।
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5 comments:
दिल नादाँ मेरा बहक गया है इस तरह कि ,
अक्स में भी अपने तुझे ही देखता हूँ आजकल।
bahut sunder , khoobsurat rachna, improving day by day, shubhkaamnayen.
bahut acchi..!!!
ati uttam..!!
bahut khub.
बहुत खूब!
तुम्हें प्रख्यात लेखक श्री ज्ञान प्रकाश विवेक की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मुझे हमेशा ताज़ा और प्रिय लगती है। मैं चाहता हूँ कि तुम ऐसी रचनाएं पढ़ो और फिर देखना तुम्हारी भीतर से लेखनी के कैसे-कैसे अंकुर फूटेंगे। मेरी शुभकामनाएं।
तेरा शो-केस भी क्या खूब ठसक रखता था
इसमें मिट्टी का खिलौना भी चमक रखता था
आपने गाड़ दिया मील के पत्थर-सा मुझे-
मेरी पूछो तो मैं चलने की ललक रखता था
वो शिकायत नहीं करता था मदारी से मगर-
अपने सीने में जमूरा भी कसक रखता था
मुझको इक बार तो पत्थर पे गिराया होता-
मैं भी आवाज़ में ताबिंदा खनक रखता था
ज़िंदगी! हमने तेरे दर्द को ऐसे रक्खा-
प्यार से जिस तरह सीता को, जनक रखता था
मर गया आज वो मेरे ही किसी पत्थर से
जो परिंदा मेरे आंगन में चहक रखता था.
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