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मंज़र बदल गया है कोई...

ये मेरे जज़्बात हैं,
इन्हें पढ़ गया है कोई,
कोई आया था यहाँ चुपके से,
क़दमों के निशाँ इस दिल पे,
छोड़ गया है कोई।

अजनबी था वो कोई,
अपना बना गया है कोई,
आहें उठा करती थी कभी,
अब धड़कनें दे गया है कोई

आसुओं को बारिश बना गया है कोई,
बंज़र ज़िन्दगी का मंज़र बदल गया है कोई,
खुश्क होती थी धड़कनें सभी,
अब उन्हें खुश कर गया है कोई

सासों को सात सुरों में पिरो गया है कोई,
जज्बातों को आवाज़ बना गया है कोई,
उठती गिरती नज़्म होती थी अक्सर,
उन्हें संभालने को लफ्ज़ दे गया है कोई

वो आहटें थी उसके आने की या,
जाते-जाते दुआएं दे गया है कोई,
वो निशाँ क़दमों के निशानी थी उसकी या,
मंजिल की राहें बता गया है कोई

रुका ना वो मेरे लिए,
वादा भी ना किया कोई,
पढ़कर जज़्बात मेरे,
मंज़र ज़िन्दगी का बदल गया है कोई

2 comments:

SWAPN said...

bahut sunder puneet , bahut achcha likh rahe ho. badhaai.shubhkaamnaon ke saath.

Shamikh Faraz said...

agr aapki aadat kavita me kahi koi prerna ka shrot hai to bhej dejie. shamikh.faraz@gmail.com

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