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ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए


खामोशी को मेरी समझे गर ,
तो कहूँ तुझसे मोहब्बत है,
जो निगाहों से कह जाए,
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।

बात जो करे गर तो
धड़कनें ख़ुद खामोश हो
तुझे सुनने को बेताब नज़र आयें,
तू जो देखे मुझे गर
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।

खिलती धूप में ढूँढूं तुझे
या चांदनी रात में तू मिल जाए,
हाथों में हाथ चलूँ मैं,
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए.

हवाओं से कह दूँ मैं,
जुल्फों को तेरी न छेड़े यूँ,
जो सवारूँ मैं उन्हें,
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।

ओस की बूंदें भी अब तो
बारिशों सा खुबसूरत एहसास दे जाए,
पत्तो की सर-सराहट सी आहटें हो तेरी
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' होती जाए।

तेरा साथ मिल जाए गर मुझे
तो कहूँ ज़िन्दगी 'ज़िन्दगी' हो जाए।

4 comments:

SWAPN said...

sunder bhavnatmak rachna.

Shamikh Faraz said...

bahut khoob likhte hain aap. gar aap likhne ka shauq rakhte hain to main aapko invite karna chahunga ke aap mere blog ke lie koi prerna se bhari kavita bhejen.
gar kabhi waqt mile to mere blog par aayen.
www.salaamzindadili.blogspot.com

प्रकाश बादल said...

पुनीत भाई आप किस को पसन्द करते हो डिपैंड करता है

प्रकाश बादल said...

बहुत से लेखक हैं जो नामी गिरामी हैं और अच्छा लिख रहे हैं

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