वैसे टेलीविजन से चिपके रहने का मुझे कोई शौक नहीं है। एक तो पहले से कोई केबल कनेक्शन नही, दूरदर्शन ही चलता है वो भी खुदा की रहमत से बिना एंटिना के। और फ़िर ना ही ऐसी कोई ख्वाइश उठती है मन में की आज रात को बस ये वाला सीरियल देखना ही है। या वो वाली पिक्चर । ना ही क्रिकेट के प्रति कोई दीवानगी है । कल संयोग से दोपहर का भोजन करते वक्त बस ऐसे ही Remote पर हाथ पड़ गया। सो देखने बैठ गए। अब जनाब दूरदर्शन है तो ज़्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं रखते कि दोपहर के वक्त कोई 75mm का cinema हमें अपने छोटे से 21 inch के टेलीविजन पर देखने को मिलेगा। फ़िर भी बैठ गए सो बैठ गए देखने।
नज़ारा कुछ ऐसा था... हमारे देश की राष्ट्रपति जी श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल दोनों सदनों को संबोधित कर रही थी (अंग्रेजी में) । उनका संबोधन समाप्त हुआ तो फ़िर उप राष्ट्रपति जी माइक पर पधारे । अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करने हेतु। अब पूरा का पूरा भाषण तो फ़िर से देने में वक्त जायर नहीं किया जा सकता। आखिर सभी नेता, राज नेता काफ़ी व्यस्त लोग होते है। कईयों को तो सदन में हाजिर होने तक समय नहीं होता । सो उप राष्ट्रपति जी ने भी सीधा shortcut ही पकड़ा। राष्ट्रपति जी के संबोधन का शुरूआती और अन्तिम भाग हिन्दी में सुनाना शुरू किया।
शुरू करने तक तो सब कुछ ठीक था... पर जैसे जैसे आगे पढने लगे तो जो बात हम आपको बताना चाहतें हैं वो भी साथ साथ आगे बढती गई। दर असल हुआ कुछ ऐसे की उन्हें हिन्दी पढने में दिक्कत महसूस हो रही थी। अब हिन्दी बोलते हुए तो हमने कभी गौर नहीं किया । पर आज जब पढ़कर बोलते हुए देखा तो सच कहूँ दंग रह गया। जनाब। उच्चारण की तो जैसे कब्र ही ख़ुद गई। एक दो बार घर से practice कर आते तो शायद कुछ बेहतर पढ़ लेते। क्षमा चाहूँगा 'बेहतर' कह रहा हूँ , 'अच्छा' नहीं। अब भला मैं भी क्या कर सकता हूँ। जो देखा, सुना वो लिख रहा हूँ। अपनी ओर से कोई ingredient नहीं डाला है। मिर्च मसाला भी नहीं है। उनके उच्चारण को देख हैरत में पड़ गया। 'स्तरीय' को 'स्त्रिय' , 'क्षेत्र' को 'शत्र', 'शाश्वत' को 'शाश्व्रत' और भी ढेरों गलतियां... जब 'शाश्वत' को ग़लत पढ़ा तो 'आश्वस्त' से भी कोई उम्मीद रखना बेमानी सी बात है। इतनी गलतियां सुन कर तो बचपन की याद आ गई। शायद तीसरी, चौथी, पांचवी कक्षा में भी इससे तो कुछ बेहतर हिन्दी ही रही होगी। हिन्दी रही हो ना रही हो। पढ़ा तो बेहतर ही होगा। अब स्कूल में तो teacher डांट डपट कर सीखा भी देते थे । नहीं मानते तो कभी कभी punishment का भी लाभ मिल जाता था। इस उम्र में तो इंसान को ख़ुद ही सीख लेना चाहिए। कम से कम एक बार स्वयं ही मंथन कर लेते, विचार विमर्श (जो की हर नेता का सबसे बड़ा गुन होता है) कर लिया होता तो हमें इस तरह कुछ सरे आम कहना नहीं पड़ता। खैर सरे आम तो आपने ही पढ़ा है सब कुछ तो हम क्यूँ भला अपने आप को दोषी ठहराएं....
अब चलते चलते उप राष्ट्रपति जी से यही आग्रह करना चाहूँगा की हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, 'हिन्दी हैं हम...' गीत भी कई बार सुना ही होगा आपने, तो कृपया इसका सम्मान करें, पढने-बोलने में कोई परेशानी होती है तो किसी की सलाह से सही पढ़ें। आप सभी लोग देश को चलाते हैं तो जनता भी आपसे उम्मीदें रखती है। अंग्रेजी के दौर में हिन्दी खोती जा रही है। बाकी नागरिकों का पता नही पर आपके देश का यह नागरिक तो कम से कम आप सभी उच्च पदों पर आसीन सम्माननीय व्यक्तियों से हिन्दी के सही प्रयोग, उपयोग की आशा रखता है। उम्मीद करता हूँ कि अगली बार शायद कुछ 'बेहतर' या फ़िर पूर्ण रूप से सही हिन्दी सुनने को मिलेगी। मैं भी एक आम आदमी हूँ और आम आदमी उम्मीदों का साथ कभी नहीं छोड़ सकता है... उम्मीदों के साहारे ही जीता है। सो मैं भी उम्मीदों कि फेहरिस्त हमेशा तैयार ही रखता हूँ। कभी भी कोई भी पुरी हो जाए तो समझो आज तो भाग खुल गए...
नज़ारा कुछ ऐसा था... हमारे देश की राष्ट्रपति जी श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल दोनों सदनों को संबोधित कर रही थी (अंग्रेजी में) । उनका संबोधन समाप्त हुआ तो फ़िर उप राष्ट्रपति जी माइक पर पधारे । अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करने हेतु। अब पूरा का पूरा भाषण तो फ़िर से देने में वक्त जायर नहीं किया जा सकता। आखिर सभी नेता, राज नेता काफ़ी व्यस्त लोग होते है। कईयों को तो सदन में हाजिर होने तक समय नहीं होता । सो उप राष्ट्रपति जी ने भी सीधा shortcut ही पकड़ा। राष्ट्रपति जी के संबोधन का शुरूआती और अन्तिम भाग हिन्दी में सुनाना शुरू किया।
शुरू करने तक तो सब कुछ ठीक था... पर जैसे जैसे आगे पढने लगे तो जो बात हम आपको बताना चाहतें हैं वो भी साथ साथ आगे बढती गई। दर असल हुआ कुछ ऐसे की उन्हें हिन्दी पढने में दिक्कत महसूस हो रही थी। अब हिन्दी बोलते हुए तो हमने कभी गौर नहीं किया । पर आज जब पढ़कर बोलते हुए देखा तो सच कहूँ दंग रह गया। जनाब। उच्चारण की तो जैसे कब्र ही ख़ुद गई। एक दो बार घर से practice कर आते तो शायद कुछ बेहतर पढ़ लेते। क्षमा चाहूँगा 'बेहतर' कह रहा हूँ , 'अच्छा' नहीं। अब भला मैं भी क्या कर सकता हूँ। जो देखा, सुना वो लिख रहा हूँ। अपनी ओर से कोई ingredient नहीं डाला है। मिर्च मसाला भी नहीं है। उनके उच्चारण को देख हैरत में पड़ गया। 'स्तरीय' को 'स्त्रिय' , 'क्षेत्र' को 'शत्र', 'शाश्वत' को 'शाश्व्रत' और भी ढेरों गलतियां... जब 'शाश्वत' को ग़लत पढ़ा तो 'आश्वस्त' से भी कोई उम्मीद रखना बेमानी सी बात है। इतनी गलतियां सुन कर तो बचपन की याद आ गई। शायद तीसरी, चौथी, पांचवी कक्षा में भी इससे तो कुछ बेहतर हिन्दी ही रही होगी। हिन्दी रही हो ना रही हो। पढ़ा तो बेहतर ही होगा। अब स्कूल में तो teacher डांट डपट कर सीखा भी देते थे । नहीं मानते तो कभी कभी punishment का भी लाभ मिल जाता था। इस उम्र में तो इंसान को ख़ुद ही सीख लेना चाहिए। कम से कम एक बार स्वयं ही मंथन कर लेते, विचार विमर्श (जो की हर नेता का सबसे बड़ा गुन होता है) कर लिया होता तो हमें इस तरह कुछ सरे आम कहना नहीं पड़ता। खैर सरे आम तो आपने ही पढ़ा है सब कुछ तो हम क्यूँ भला अपने आप को दोषी ठहराएं....
अब चलते चलते उप राष्ट्रपति जी से यही आग्रह करना चाहूँगा की हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, 'हिन्दी हैं हम...' गीत भी कई बार सुना ही होगा आपने, तो कृपया इसका सम्मान करें, पढने-बोलने में कोई परेशानी होती है तो किसी की सलाह से सही पढ़ें। आप सभी लोग देश को चलाते हैं तो जनता भी आपसे उम्मीदें रखती है। अंग्रेजी के दौर में हिन्दी खोती जा रही है। बाकी नागरिकों का पता नही पर आपके देश का यह नागरिक तो कम से कम आप सभी उच्च पदों पर आसीन सम्माननीय व्यक्तियों से हिन्दी के सही प्रयोग, उपयोग की आशा रखता है। उम्मीद करता हूँ कि अगली बार शायद कुछ 'बेहतर' या फ़िर पूर्ण रूप से सही हिन्दी सुनने को मिलेगी। मैं भी एक आम आदमी हूँ और आम आदमी उम्मीदों का साथ कभी नहीं छोड़ सकता है... उम्मीदों के साहारे ही जीता है। सो मैं भी उम्मीदों कि फेहरिस्त हमेशा तैयार ही रखता हूँ। कभी भी कोई भी पुरी हो जाए तो समझो आज तो भाग खुल गए...





2 comments:
puneet dhanyawaad aapke comments padhkar achcha laga, aur jyada achha laga yah jaankar ki tumhen meri rachnayein itni achchi lagti hain ki tum unki tulna karne lage , bahut khoob puneet, zara dhyaan se padho to rachna ke neeche rachna ki date likhi hai ab khud hi samajh jaao. aaj se lagbhag 26 years pahle ki rachna , ab lekhni kuchh paripakve hai. ab bhi mujhe santushti nahin hai. abhi bahut kamian hain. khair, tumhara upar lekh padha achha aur sachchai likhi hai. likhte raho, saath hi padhte bhi raho. mujhe bhi comments dete raho mujhe bilkul bura nahin lagega.god bless u.
puneet pl send your email address.
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