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ज़रूरत थी जब किसी अपने की...




ज़रूरत थी जब किसी अपने की
मैं खुदा को ढूंढ़ लाया,
तलाश थी मोहब्बत के काफिलों की
ना जाने कहाँ से वो बेवफा चला आया।

झूठे वादे कहीं से ,
कहीं से सिर्फ़ झूठे दिलासे ले आया ,
गया जहाँ कहीं भी, हर दफा,
किसी दगाबाज़ से मिल आया ।

आदत बड़ी बुरी थी यारों,
खुद्दारी से जीने की,
जब कभी बिकता ईमान देखा
तो परदे गिरा आया।

साथ मिलना किसी का तो
नामुमकीन सी बात थी,
मैं अकेला ही हर जंग जीत आया।

हँसते चेहरों के पीछे क्या है,
पता था मुझे,
उन्हें भी मैं हकीक़त के आईने दिखा आया।

गिरा जब कभी किसी का सहारा ना था,
चंद इमारतें क्या खड़ी हुई अमीरी की,
हर कोई दौडा चला आया ।

पैसे को पूछती है दुनिया,
पैसे को पूजती है दुनिया,
कल तक किनारा कर गुज़रता था वो,
आज वो भी अपना बन चला आया।

ज़िन्दगी को देखा है मैंने हर नज़रिए से,
मेरे बुरे दिनों को भुलाकर हर कोई
आज अच्छे दिनों में साथ निभाने चला आया।
अपनेपन का ताज पहने सर पे,
कोई मुझे 'भाई' तो कोई 'बेटा'
और पता नहीं कितने 'अपने से' ही
नामों से पुकारता नज़र आया.....

ज़रूरत थी जब किसी अपने की मैं खुदा को ढूंढ़ लाया....

3 comments:

ARVI'nd said...

nice to read you dear...bahut achha laga ye post padhkar...aapki soch bahut achhi hai ese barkaraar rakhna....aapke jaise yuvao ki bahut jarurat hai hamare desh ko

ARVI'nd said...
This comment has been removed by the author.
saloni said...

aapki yah kavita dil ko chhu gayi.good done.

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