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ग़लत-फहमी में जीने दे

आज होंश तू मेरे गुम रहने दे,
जी लिया हूँ बहुत मैं 'हकीक़त' के ज़माने में,
अब बेहतर है तू मुझे ग़लत-फहमी में जीने दे।

भीड़ में खो जाता हूँ अक्सर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
अकेले ही चलने दे।

आहें उठती हैं यहाँ दर-ब-दर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
धडकनों के साज़ सुनने दे।

झूठे मुस्कुराते चेहरे कई दीखते हैं इधर-उधर
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
अकेले ही सिसकने दे।

दर्द और ज़ख्मों के सहारे मिलते हैं बस यहाँ पर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
बेसहारा ही रहने दे।

हादसों पर हादसे होते हैं हर मोड़ पर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
चैन औ सुकून से मरने दे।

'अजीब' सी यह हसरत पूरी करने दे,
आज होंश तू मेरे गुम रहने दे,
बेहतर है तू मुझे ग़लत-फहमी में जीने दे।

2 comments:

विनय said...

बहुत मनोभावना से बहुत सुन्दर कविता का जन्म हुआ है!


---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

प्रकाश बादल said...

अच्छा है पुनीत भाई,

लिखते रहो और साथ में मेरी एक और सलाह भी तुमको माननी ही होगी कि तुम्हें लिखने के साथ पढ़ना भी होगा उससे तुम्हारा लेखन और निखरेगा। अभी भी तुम अच्छा ही लिख रहे हो ।

मेरी शुभकामनाएँ।

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