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तुझे अपनी फरियाद बना बैठा...

आज फ़िर पुरानी यादें ताज़ा कर बैठा ,
फ़िर वही नादानी कर बैठा,
किसी तरह मिटाया था उस तस्वीर को,
जाने क्यूँ फ़िर उसी को
सँवारने की आस लगा बैठा

आज फ़िर तुझे अपनी फरियाद बना बैठा,
खुदा से तुझे पाने की ज़िद्द कर बैठा,
एक बार फ़िर तन्हा था आज ,
और बरबस ही चाँद सितारों से
तेरी बातें कर बैठा।

आज फ़िर वही 'अजीब' सी खता कर बैठा,
भूलाना था तुझे पर
अपनी उम्मीद के गलियारों में
तेरे लौट आने की आस लगा बैठा....

1 comments:

"अर्श" said...

बहोत खूब लिखा है आपने ढेरो बधाई .................


अर्श

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