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वो गली अपनी थी


वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था,
पास-पड़ोस का हर शख्स
जब अपने घर का हिस्सा था।

वो दादी की कहानियो में
था कभी बचपन, तो कभी यौवन,
कहानी की रानी अपनी थी
वो राजा अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो पड़ोस में चबूतरे पर बैठी
चाची को सताने का मज़ा अपना था,
वो चाची अपनी थी,
वो पड़ोस अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

बच्चों की एक टोली
गली में दौड़ा करती थी,
कभी इस आँगन कभी उस आँगन
खेला करती थी,
वो 'गिल्ली' अपनी थी, वो 'डंडा' अपना था
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

घर के आँगन में लगे पेड़ पर
चिडियाँ का बसेरा था
तिनकों से घर बनते देखा था,
वो चिडियाँ अपनी थी
वो घरौन्दा अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो चौक में खड़े पीपल के नीचे
बड़े-बुजुर्गों का डेरा था,
उनकी बातों में उम्र का तजुर्बा था,
वो हँसी अपनी थी, वो ठहाका अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो खुशी किसी की
त्यौहार गली का था,
किसी के ग़म में शुमार
पूरा मौहल्ला था,
खुशियाँ ज्यादा थी, ग़म थोडा था,
जब वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

2 comments:

''ANYONAASTI '' said...

एक अच्छी भावनात्मक सुंदर कविता [स्वतंत्र पद्य ]

Indravardhan said...

बहुत खूब !!

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