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गुजरात ब्रांड के आँसू न मागियें ...



आसूओं का ब्यापार करता हूँ

ब्रांड वाले आसूओं पर छूट प्रदान करता हूँ

अगर है जान-पहचान तो

बिना ब्रांड वालों पर भी

कुछ इंतजाम करता हूँ

मौसम है आतंकवाद के आसूओं का

कीमत इनकी आसमान छू रही है

सिंगुर और नंदीग्राम सस्ते हैं

चाहिए तो ले जाईये

लेकिन कृपा करके

गुजरात ब्रांड के आँसू न मागियें

इनके लिए लम्बी लाइन है

हर पार्टी वालों में लडाई है

और इसमें मेरी तो शामत आई है

इसलिए सुझाव है

पानी से आई तबाही के

आँसू खरीदिये

जनता की नजरों में हीरो बनिए

दाम इनके सस्ते हैं

थोक में लें

साथ ऑफ़र भी है ...........



http://manavaajkal.blogspot.com/


वो गली अपनी थी


वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था,
पास-पड़ोस का हर शख्स
जब अपने घर का हिस्सा था।

वो दादी की कहानियो में
था कभी बचपन, तो कभी यौवन,
कहानी की रानी अपनी थी
वो राजा अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो पड़ोस में चबूतरे पर बैठी
चाची को सताने का मज़ा अपना था,
वो चाची अपनी थी,
वो पड़ोस अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

बच्चों की एक टोली
गली में दौड़ा करती थी,
कभी इस आँगन कभी उस आँगन
खेला करती थी,
वो 'गिल्ली' अपनी थी, वो 'डंडा' अपना था
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

घर के आँगन में लगे पेड़ पर
चिडियाँ का बसेरा था
तिनकों से घर बनते देखा था,
वो चिडियाँ अपनी थी
वो घरौन्दा अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो चौक में खड़े पीपल के नीचे
बड़े-बुजुर्गों का डेरा था,
उनकी बातों में उम्र का तजुर्बा था,
वो हँसी अपनी थी, वो ठहाका अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो खुशी किसी की
त्यौहार गली का था,
किसी के ग़म में शुमार
पूरा मौहल्ला था,
खुशियाँ ज्यादा थी, ग़म थोडा था,
जब वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

अच्छा लगता है...




सच कहता हूँ मैं
तेरा नाम बड़ा प्यारा लगता है,
मासूमियत को देख तेरी
हैरान होता हूँ पर,
तेरा बचपना बड़ा अच्छा लगता है

तेरा साथ यूँ मिला है मुझे
कोई ख्वाब सा लगता है,
जी करता है तुझसे बात करता रहूँ ,
पर खामोश रह कर
तेरी धड़कनें सुनना अच्छा लगता है

तेरी सादगी , तेरा भोलापन ,
हर रूप तेरा सच्चा लगता है,
तू कहती रहे मैं सुनता रहूँ,
हर लफ्ज़ तेरा दुआ लगता है,
तेरा साथ गुज़रता है जो हर लम्हा
बड़ा अच्छा लगता है.....

ये क्या हुआ है मुझे...




ये क्या हुआ है मुझे
कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।
किसी से बात नहीं करता मैं,
कुछ लिख भी नहीं पा रहा हूँ,
बस अपने ही दायरे में
सिमटता चला जा रहा हूँ।

कोई बात नही अब खुशी की मेरे लिए,
ना ही कोई ग़म भरी रात है जागने के लिए,
अकेलेपन ने इस कदर घेरा है मुझे,
अपने ही जज़्बातों को खोता जा रहा हूँ।

दर्द दिल का जताता नही किसी से,
मुस्कुराता भी नही मैं,
ना ही ठीक से रो पा रहा हूँ,
किस दौर से गुज़र रहा हूँ मैं,
ये क्या हुआ है मुझे
कुछ समझ नही पा रहा हूँ।

Untitled




तेरी तस्वीर को आईना बनाकर
मैं तेरी निघाहों में ख़ुद को
ढूँढने का बहाना करता हूँ,
सच तो यह है कि,
तेरी खामोश नज़रों में
मैं तेरी अनकही बातें ढूंढता हूँ,
ढूंढता हूँ मेरे सवालों का जवाब ,
और वो मोहब्बत जो तू
जताती नहीं उसे ढूंढता हूँ,
मुझे देख कर मुस्कुराती है तू
पर बतियाती नहीं,
इसकी वजह ढूँढता हूँ,
तेरी खूबसूरती को
किस तरह बयान करूँ,
हर वक्त बस वही लफ्ज़
वही खयालात ढूंढता हूँ....

निशानी

तू सताती है, हंसाती है, रुलाती है
फ़िर भी हर शरारत तेरी
नज़ाकत कहलाती है

तेरा नज़रें चुराना, मिलाना,
मुझे देख कर यूँ मुस्कुराना,
ये ही तो वो बातें हैं
जो याद आती है

तेरा वो पलकें झुकाना, उठाना,
उठा कर फ़िर से झुकाना,
ये ही सब हरकतें है तेरी
जो अदा कहलाती हैं

धड़कनें मेरी साँसे तेरी,
सारे ज़माने भर से
सिर्फ़ बातें तेरी
ये ही तो है 'निशानी' उसकी
जो 'मोहब्बत' कहलाती है।


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