Theme Preview Rss

दिवाली

मेरे शहर की भीड़ में
एक बस्ती बसती है,
एक छोटा से घर है वहाँ
छोटा सा दर है उसका,
ढेर सारी खुशियाँ जहाँ रहती है ।

तंग रास्ते हैं, तंग गलियाँ हैं,
पर दिलों के रास्तों में
कोई रुकावट नही है ।
दिल से दीये जलते हैं,
दिखावे की दिवाली नही है,
मिल जुल कर रहते हैं सब ,
अपना पराया कोई नही है ।

मासूमों के चेहरों पे
बाज़ार का रंग नही चढा है अब तक,
उनके लिए सस्ता महँगा कुछ नही है,
खुशियों की अहमियत है वहां
रुपये पैसों का कोई वजूद नही है।

दिवाली मनती है सिर्फ़ दिल से ही
मिठाइयों, पटाखों की कमी
किसी को नही खलती है ,
उस बस्ती की दिवाली में
सच्ची खुशियाँ बसती है....

0 comments:

Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin