Theme Preview Rss

Untitled

ख्यालों से शुरुआत हुई थी ,

ख्वाबों में तुमसे मुलाक़ात हुई थी,

लबों ने चाहे कुछ न कहा हो मगर,

आंखों ही आंखों में कोई बात तो ज़रूर हुई थी


लाख कोशिश की थी तुमने

दामन अपना चुराने की ,

ख़ुद को मुझसे बचाने की,

पर दिल में तुम्हारे भी

कोई हलचल तो ज़रूर हुई थी


नज़रें
तुम्हारी झुकी - झुकी सी थी ,

लबों की हँसी भी हया से रुकी रुकी सी थी ,

पर चोरी छुपे मुझे देख कर

मुस्कुराने की खता तो ज़रूर हुई थी।


कुछ शरमाई हुई सी तुम थी,

कुछ घबराई हुई सी तुम थी,

और अचानक से मेरे छू कर

गुज़र जाने पर तुम्हें,
धड़कनें तुम्हारे दिल की भी
तेज़ तो ज़रूर हुई थी

हकीक़त में ना हुई हो भले ही
पर ख्वाबों में ही सही
इज़हार--मोहब्बत की
बात तो ज़रूर हुई थी




दिवाली

मेरे शहर की भीड़ में
एक बस्ती बसती है,
एक छोटा से घर है वहाँ
छोटा सा दर है उसका,
ढेर सारी खुशियाँ जहाँ रहती है ।

तंग रास्ते हैं, तंग गलियाँ हैं,
पर दिलों के रास्तों में
कोई रुकावट नही है ।
दिल से दीये जलते हैं,
दिखावे की दिवाली नही है,
मिल जुल कर रहते हैं सब ,
अपना पराया कोई नही है ।

मासूमों के चेहरों पे
बाज़ार का रंग नही चढा है अब तक,
उनके लिए सस्ता महँगा कुछ नही है,
खुशियों की अहमियत है वहां
रुपये पैसों का कोई वजूद नही है।

दिवाली मनती है सिर्फ़ दिल से ही
मिठाइयों, पटाखों की कमी
किसी को नही खलती है ,
उस बस्ती की दिवाली में
सच्ची खुशियाँ बसती है....

यूँ ही थाम कर हाथ मेरा

यूँ ही थाम कर हाथ मेरा
तुम बैठी रहो,
कोई बात सुनो मेरी
या तुम ही कुछ कहती रहो.

झुकी हुई इन पलकों को अपनी ,
जो उठाओगी इस तरह ,
चोट किसी दिल को लग जायेगी ,
इस अदा को देख कर तुम्हारी ,
नज़रें आईने की भी शर्म से झुक जाएँगी.

नज़रों से मेरी
नज़रें अपनी मिलाओ,
धड़कनें सुनो मेरे दिल की
या कुछ तुम ही मुझे सुनाओ.

मुस्कुराओगी जो तुम इस तरह,
कलियाँ भी तुम से रूठ जाएँगी,
चेहरा अपना छुपा लो आँचल में कि,
चांदनी चाँद कि भी
कहीं बादलों में खो जायेगी .

मदहोश इस समां को
यूँ खामोश ना बनाओ,
कोई नगमा प्यार का,
मैं सुनाऊं तुम्हे,
या तुम ही कुछ गुनगुनाओ .

बस यूँ ही थाम कर हाथ मेरा
तुम बैठी रहो ,
कोई बात सुनो मेरी
या तुम ही कुछ कहती रहो.

तलाश

अनकहे सवालों के जवाब ढूंढ रहा हूँ,
खामोशी में गुम कोई आवाज़ ढूंढ रहा हूँ ।

रात के अंधेरों में उजालों की परछाई ढूंढ रहा हूँ,
पुरानी उन यादों में फ़िर कोई नई बात ढूंढ रहा हूँ ।

इन अनजान चेहरों में कोई अपना ढूंढ रहा हूँ,
बंद लिफाफों में पैगाम कोई अपने नाम ढूंढ रहा हूँ ।

खोई हुई उन राहों में मंजिल अपनी ढूंढ रहा हूँ,
भीड़ में शामिल अपनी 'शख्सियत' ढूंढ रहा हूँ ।

झूठी इन तस्वीरों में आईना कोई सच का ढूंढ रहा हूँ,
हाथ की इन लकीरों में तकदीर अपनी ढूंढ रहा हूँ ।

मुरझा गए है क्यूँ ये फूल सभी...??
इनकी खोयी मुस्कान ढूंढ रहा हूँ...
बेजान इन पत्थर दिलों में आज
एक नई जान ढूंढ रहा हूँ....

तलाश ये अधूरी है आज भी...
जब होगी ये पूरी...
वो दिन वो रात ढूंढ रहा हूँ...


Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin