Theme Preview Rss

शरारत

खुली जुल्फों को देख कर उसकी,
शरारत हवाओं को सूझ रही थी,
हवाओं के इस रुख को ,
हैरान उसकी निघाहें देख रही थी।

परेशान कर रही थी हवाएं,
उसे छेड़ रहीं थी,
बड़ी मासूमियत के साथ वो
उनसे जगड़ रही थी।

चहरे की सिलवटों में उसकी
गज़ब की अदाएं थी,
जुल्फ सवारते उन नाजुक
हाथों को थाम लेने की हसरत
इस दिल में पल रही थी।

कुछ उडी-उडी,
कुछ चहरे पे रुकी - रुकी ,
जुल्फें उसकी सावन की घटाएं थी
हवाओं की भी कोशिश आज
बिन मौसम बरसात की लग रही थी।

किस्मत किस तरह...

किस्मत किस तरह धोखा देती है हमने देखा है,
अपने भी कब अजनबी बन जाते है हमें सब पता है,
किसी से शिकायत नहीं करता मैं,
पर ये नासमझ दिल बहुत रोता है...
(दर्द इस दिल का आंखों से झलकता है,
फ़िर कभी भरे पैमाने की तरह छलकता है....)

तुझे अपनी फरियाद बना बैठा...

आज फ़िर पुरानी यादें ताज़ा कर बैठा ,
फ़िर वही नादानी कर बैठा,
किसी तरह मिटाया था उस तस्वीर को,
जाने क्यूँ फ़िर उसी को
सँवारने की आस लगा बैठा

आज फ़िर तुझे अपनी फरियाद बना बैठा,
खुदा से तुझे पाने की ज़िद्द कर बैठा,
एक बार फ़िर तन्हा था आज ,
और बरबस ही चाँद सितारों से
तेरी बातें कर बैठा।

आज फ़िर वही 'अजीब' सी खता कर बैठा,
भूलाना था तुझे पर
अपनी उम्मीद के गलियारों में
तेरे लौट आने की आस लगा बैठा....

माँ

माँ ! थक गया हूँ बहुत,
आज, थोड़ा आराम करने दे, माँ।

माँ ! कई रातों से सोया नहीं,
आज, अपनी गोद में सर रखने दे, माँ।

माँ ! तेरी छुवन महसूस किए कई महीने गुज़र गए,
आज, अपने हाथों से मेरे बालों को सहला दे, माँ।

माँ ! एक ज़माना गुज़र गया किसी ने प्यार से पुकारा नहीं,
आज, एक लोरी तू सूना दे , माँ।

माँ ! किसी को वक्त नहीं कि मुझसे बात करे,
आज, एक कहानी तू कह दे, माँ

माँ ! इस भीड़ में मुझे किसी ने सुना नहीं,
आज, तू मुझे कुछ कहने दे, माँ।

माँ ! याद तू रोज़ आई पर ये आंसू ना आए,
आज, तू मुझे थोड़ा रोने दे, माँ ।

माँ ! बहुत थक गया हूँ जी कर इस तरह,
आज, तू मुझे सोने दे , माँ।

कोई है जो आजकल...



कोई है जो आजकल मेरा ख़याल रखता है,
रातों को सोता नही,
मेरे ही ख़्वाबों में खोता है,
अक्स में भी अपने
बस वो ही दिखता है,
अक्सर मेरा भी हाल
कुछ ऐसा ही होता है।

बात करते-करते खामोश हो जाऊँ गर
'क्या हुआ है तुम्हें?'
'सब कुछ ठीक तो है न ?'
कई प्यार भरे सवाल करता है।

पल भर के लिए छाई
उस बेचैनी को देख
नासमझ इस दिल को सुकून मिलता है,
सोचता है इसके बारे में भी कोई,
सोच कर बड़ा खुश होता है।

जवाब नहीं देते है लब ये और
मुस्कुरा जाते हैं,
ये सब देख यार मेरा
थोड़ा नाराज़ होता है।

बातें छुपाना, बहाने बनाना,
थोड़ा सताना, रूठना - मनाना,
ये सब 'अजीब' सी खुशी देता है,
कोई है जो आजकल मेरा ख़याल रखता है....

खामोश रहता हूँ...





किसी से बात करूँ मैं
मेरा दिल करता नहीं ,
लिखूं भी तो क्या लिखूं,
अरमां कोई मचलता नहीं,
खामोश रहता हूँ अब मैं अक्सर ,
शोरगुल भी इस दुनिया का
मुझे तंग करता नहीं।


हैरान होता हूँ इन हर पल
बदलते चेहरों को देख कर,
जिन रास्तों पे घर हैं उनका
जो हकीक़त से नज़रें चुराते हैं,
उन गलियों से अब मैं गुज़रता नहीं,
खामोश रहता हूँ अब मैं अक्सर ,
शोरगुल भी इस दुनिया का
मुझे तंग करता नहीं।


सोचता हूँ किस तरह लोग
फरेबी बन जाते हैं,
झूठ को भी सच और
सच को भी झूठ बताते हैं ,
अब उनसे कोई सवालात मैं करता नहीं,
खामोश रहता हूँ अब मैं अक्सर,
शोरगुल भी इस दुनिया का
मुझे तंग करता नहीं।

गुजरात ब्रांड के आँसू न मागियें ...



आसूओं का ब्यापार करता हूँ

ब्रांड वाले आसूओं पर छूट प्रदान करता हूँ

अगर है जान-पहचान तो

बिना ब्रांड वालों पर भी

कुछ इंतजाम करता हूँ

मौसम है आतंकवाद के आसूओं का

कीमत इनकी आसमान छू रही है

सिंगुर और नंदीग्राम सस्ते हैं

चाहिए तो ले जाईये

लेकिन कृपा करके

गुजरात ब्रांड के आँसू न मागियें

इनके लिए लम्बी लाइन है

हर पार्टी वालों में लडाई है

और इसमें मेरी तो शामत आई है

इसलिए सुझाव है

पानी से आई तबाही के

आँसू खरीदिये

जनता की नजरों में हीरो बनिए

दाम इनके सस्ते हैं

थोक में लें

साथ ऑफ़र भी है ...........



http://manavaajkal.blogspot.com/


वो गली अपनी थी


वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था,
पास-पड़ोस का हर शख्स
जब अपने घर का हिस्सा था।

वो दादी की कहानियो में
था कभी बचपन, तो कभी यौवन,
कहानी की रानी अपनी थी
वो राजा अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो पड़ोस में चबूतरे पर बैठी
चाची को सताने का मज़ा अपना था,
वो चाची अपनी थी,
वो पड़ोस अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

बच्चों की एक टोली
गली में दौड़ा करती थी,
कभी इस आँगन कभी उस आँगन
खेला करती थी,
वो 'गिल्ली' अपनी थी, वो 'डंडा' अपना था
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

घर के आँगन में लगे पेड़ पर
चिडियाँ का बसेरा था
तिनकों से घर बनते देखा था,
वो चिडियाँ अपनी थी
वो घरौन्दा अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो चौक में खड़े पीपल के नीचे
बड़े-बुजुर्गों का डेरा था,
उनकी बातों में उम्र का तजुर्बा था,
वो हँसी अपनी थी, वो ठहाका अपना था,
वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

वो खुशी किसी की
त्यौहार गली का था,
किसी के ग़म में शुमार
पूरा मौहल्ला था,
खुशियाँ ज्यादा थी, ग़म थोडा था,
जब वो गली अपनी थी
वो मौहल्ला अपना था।

अच्छा लगता है...




सच कहता हूँ मैं
तेरा नाम बड़ा प्यारा लगता है,
मासूमियत को देख तेरी
हैरान होता हूँ पर,
तेरा बचपना बड़ा अच्छा लगता है

तेरा साथ यूँ मिला है मुझे
कोई ख्वाब सा लगता है,
जी करता है तुझसे बात करता रहूँ ,
पर खामोश रह कर
तेरी धड़कनें सुनना अच्छा लगता है

तेरी सादगी , तेरा भोलापन ,
हर रूप तेरा सच्चा लगता है,
तू कहती रहे मैं सुनता रहूँ,
हर लफ्ज़ तेरा दुआ लगता है,
तेरा साथ गुज़रता है जो हर लम्हा
बड़ा अच्छा लगता है.....

ये क्या हुआ है मुझे...




ये क्या हुआ है मुझे
कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।
किसी से बात नहीं करता मैं,
कुछ लिख भी नहीं पा रहा हूँ,
बस अपने ही दायरे में
सिमटता चला जा रहा हूँ।

कोई बात नही अब खुशी की मेरे लिए,
ना ही कोई ग़म भरी रात है जागने के लिए,
अकेलेपन ने इस कदर घेरा है मुझे,
अपने ही जज़्बातों को खोता जा रहा हूँ।

दर्द दिल का जताता नही किसी से,
मुस्कुराता भी नही मैं,
ना ही ठीक से रो पा रहा हूँ,
किस दौर से गुज़र रहा हूँ मैं,
ये क्या हुआ है मुझे
कुछ समझ नही पा रहा हूँ।

Untitled




तेरी तस्वीर को आईना बनाकर
मैं तेरी निघाहों में ख़ुद को
ढूँढने का बहाना करता हूँ,
सच तो यह है कि,
तेरी खामोश नज़रों में
मैं तेरी अनकही बातें ढूंढता हूँ,
ढूंढता हूँ मेरे सवालों का जवाब ,
और वो मोहब्बत जो तू
जताती नहीं उसे ढूंढता हूँ,
मुझे देख कर मुस्कुराती है तू
पर बतियाती नहीं,
इसकी वजह ढूँढता हूँ,
तेरी खूबसूरती को
किस तरह बयान करूँ,
हर वक्त बस वही लफ्ज़
वही खयालात ढूंढता हूँ....

निशानी

तू सताती है, हंसाती है, रुलाती है
फ़िर भी हर शरारत तेरी
नज़ाकत कहलाती है

तेरा नज़रें चुराना, मिलाना,
मुझे देख कर यूँ मुस्कुराना,
ये ही तो वो बातें हैं
जो याद आती है

तेरा वो पलकें झुकाना, उठाना,
उठा कर फ़िर से झुकाना,
ये ही सब हरकतें है तेरी
जो अदा कहलाती हैं

धड़कनें मेरी साँसे तेरी,
सारे ज़माने भर से
सिर्फ़ बातें तेरी
ये ही तो है 'निशानी' उसकी
जो 'मोहब्बत' कहलाती है।


Untitled

ख्यालों से शुरुआत हुई थी ,

ख्वाबों में तुमसे मुलाक़ात हुई थी,

लबों ने चाहे कुछ न कहा हो मगर,

आंखों ही आंखों में कोई बात तो ज़रूर हुई थी


लाख कोशिश की थी तुमने

दामन अपना चुराने की ,

ख़ुद को मुझसे बचाने की,

पर दिल में तुम्हारे भी

कोई हलचल तो ज़रूर हुई थी


नज़रें
तुम्हारी झुकी - झुकी सी थी ,

लबों की हँसी भी हया से रुकी रुकी सी थी ,

पर चोरी छुपे मुझे देख कर

मुस्कुराने की खता तो ज़रूर हुई थी।


कुछ शरमाई हुई सी तुम थी,

कुछ घबराई हुई सी तुम थी,

और अचानक से मेरे छू कर

गुज़र जाने पर तुम्हें,
धड़कनें तुम्हारे दिल की भी
तेज़ तो ज़रूर हुई थी

हकीक़त में ना हुई हो भले ही
पर ख्वाबों में ही सही
इज़हार--मोहब्बत की
बात तो ज़रूर हुई थी




दिवाली

मेरे शहर की भीड़ में
एक बस्ती बसती है,
एक छोटा से घर है वहाँ
छोटा सा दर है उसका,
ढेर सारी खुशियाँ जहाँ रहती है ।

तंग रास्ते हैं, तंग गलियाँ हैं,
पर दिलों के रास्तों में
कोई रुकावट नही है ।
दिल से दीये जलते हैं,
दिखावे की दिवाली नही है,
मिल जुल कर रहते हैं सब ,
अपना पराया कोई नही है ।

मासूमों के चेहरों पे
बाज़ार का रंग नही चढा है अब तक,
उनके लिए सस्ता महँगा कुछ नही है,
खुशियों की अहमियत है वहां
रुपये पैसों का कोई वजूद नही है।

दिवाली मनती है सिर्फ़ दिल से ही
मिठाइयों, पटाखों की कमी
किसी को नही खलती है ,
उस बस्ती की दिवाली में
सच्ची खुशियाँ बसती है....

यूँ ही थाम कर हाथ मेरा

यूँ ही थाम कर हाथ मेरा
तुम बैठी रहो,
कोई बात सुनो मेरी
या तुम ही कुछ कहती रहो.

झुकी हुई इन पलकों को अपनी ,
जो उठाओगी इस तरह ,
चोट किसी दिल को लग जायेगी ,
इस अदा को देख कर तुम्हारी ,
नज़रें आईने की भी शर्म से झुक जाएँगी.

नज़रों से मेरी
नज़रें अपनी मिलाओ,
धड़कनें सुनो मेरे दिल की
या कुछ तुम ही मुझे सुनाओ.

मुस्कुराओगी जो तुम इस तरह,
कलियाँ भी तुम से रूठ जाएँगी,
चेहरा अपना छुपा लो आँचल में कि,
चांदनी चाँद कि भी
कहीं बादलों में खो जायेगी .

मदहोश इस समां को
यूँ खामोश ना बनाओ,
कोई नगमा प्यार का,
मैं सुनाऊं तुम्हे,
या तुम ही कुछ गुनगुनाओ .

बस यूँ ही थाम कर हाथ मेरा
तुम बैठी रहो ,
कोई बात सुनो मेरी
या तुम ही कुछ कहती रहो.

तलाश

अनकहे सवालों के जवाब ढूंढ रहा हूँ,
खामोशी में गुम कोई आवाज़ ढूंढ रहा हूँ ।

रात के अंधेरों में उजालों की परछाई ढूंढ रहा हूँ,
पुरानी उन यादों में फ़िर कोई नई बात ढूंढ रहा हूँ ।

इन अनजान चेहरों में कोई अपना ढूंढ रहा हूँ,
बंद लिफाफों में पैगाम कोई अपने नाम ढूंढ रहा हूँ ।

खोई हुई उन राहों में मंजिल अपनी ढूंढ रहा हूँ,
भीड़ में शामिल अपनी 'शख्सियत' ढूंढ रहा हूँ ।

झूठी इन तस्वीरों में आईना कोई सच का ढूंढ रहा हूँ,
हाथ की इन लकीरों में तकदीर अपनी ढूंढ रहा हूँ ।

मुरझा गए है क्यूँ ये फूल सभी...??
इनकी खोयी मुस्कान ढूंढ रहा हूँ...
बेजान इन पत्थर दिलों में आज
एक नई जान ढूंढ रहा हूँ....

तलाश ये अधूरी है आज भी...
जब होगी ये पूरी...
वो दिन वो रात ढूंढ रहा हूँ...


Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin